Saturday, October 31, 2020

मुझे खुद पर धिक्कार होना चाहिए


जब तेरे दर्द को लिखने पर खत्म हो जाए मेरी सियाही
जब लोकतंत्र की आड़ में चल रही हो राजशाही
ऐसी गली व्यवस्था से इंकार होना चाहिए 
........और गर हो न ऐसा
तो मुझे ख़ुद पर धिक्कार होना चाहिए


जब तेरे हक की न मांगू मैं दुआएं
जब इकलौती डिबरी भी तेरे घर की बुझ जो जाए
तब मेरी किस्मत में न कोई खुशी न त्यौहार होना चाहिए
........और गर हो न ऐसा
तो मुझे ख़ुद पर धिक्कार होना चाहिए


जो तेरे दर्द बयाँ करने का प्रयास कर रहा हो
जो तेरी आँख भर आने पर ख़ुद मर रहा हो
मेरा क़ुरान ,मेरा रामायण वो अखबार होना चाहिए
........और गर हो न ऐसा
तो मुझे ख़ुद पर धिक्कार होना चाहिए


जो तेरी मेरी नफ़रत के बीच राजनीति चमकाए
हमारी हज़ार आह पर जिसका ज़मीर चकनाचूर न हो जाए
ऐसा न संसद धाम में मौजूद कोई मक्कार होना चाहिए
........और गर हो न ऐसा
तो मुझे ख़ुद पर धिक्कार होना चाहिए


जो मुझे अय्याशी की चमक भा रही हो
जो मौजूद रहूँ मैं उस कोठे में जहाँ तेरी बेटी नाच गा रही हो
तेरी लाश पर टिका न कोई ऐसा मेला या बाज़ार होना चाहिए
........और गर हो न ऐसा
तो मुझे ख़ुद पर धिक्कार होना चाहिए


जब तेरे घाव पर मरहम करते , मेरी जात बीच में आ जाए
जब तेरे शहीद होने पर ये विपुल संवेदनहीन हो जाए
ऐसा न कोई दिन या लम्हा भी एक बार होना चाहिए
........और गर हो न ऐसा
तो मुझे ख़ुद पर धिक्कार होना चाहिए

Thursday, August 27, 2020

क्या रक्खा है !

मज़ा तो तब जब तुम्हारे बाल संवारते सुनाएँ
वगरना ग़ज़ल सुनाने में क्या रक्खा है

मुझे अपनी किस्मत से वफ़ा की उम्मीद नहीं
तुझे खोने के डर से इकरार को दबा रक्खा है

आइना होगा तो उम्र पर हँसेगा सो पटक दिया
हमने इसी बेपरवाही से ख़ुद को जवां रक्खा है

अदालत की कार्रवाई ! मियाँ मज़ाक छोड़ो
मेरे गुनाह से पहले तैयार फैसला रक्खा है

तेरा ज़िक्र छेड़ने से ख़ुद को रोक नहीं पाते
ये तुमने हमें क्या सिखा रक्खा है

हवाओं के बदलने का इंतज़ार कमज़ोरों को था
हमने तो ख़ुद ही कबसे दिया बुझा रक्खा है

तू नहीं तो अब वो घड़ी मिले
जिसमें तेरी आँखों का मज़ा रक्खा है

कोई है मेरे अंदर जिसे तेरे लौटने की उम्मीद है
इसी उम्मीद पर सबको , तेरा चेहरा बता रक्खा है

             
                                                         -  विपुल

Sunday, July 26, 2020

गुनाह करना चाहता हूँ

वो घाव जिन्हें सूखने का हक़ नहीं
जिनके लिए बेईमानी है मरहम
वो घाव जिन पर जाते ही घिनना जाती हैं
आपकी नज़रें
उन सारे घाव की दवा करना चाहता हूँ
माफ़ कीजिये मैं गुनाह करना चाहता हूँ


जो दिखाया गया था नींद का सपना
जिस उम्मीद पर आँधी और तूफ़ानों को
पार कर आये हैं इतने लोग
क्या बड़ा मांगते हैं आपसे
मौत से पहले , सुकून से
आँखें बंद करने की इजाज़त ?
हमारी नींद को आप यही नाम देंगे
तो ठीक है , मैं नशा करना चाहता हूँ
माफ़ी हुज़ूर , मैं गुनाह करना चाहता हूँ


मुझे मालूम होता कि
कानून की किताबें
बस दफ़्तर की अलमारियों की हैं
तो क्यों पढ़ता उन्हें
और अब उनका हवाला देकर
ग़ैर अख़लाक़ी को दूना करना चाहता हूँ
माफ़ी मालिक ! मैं गुनाह करना चाहता हूँ


जो हड्डियां भट्टों में जल चुकी हैं
जो जबड़े अपना काम भूल चुके हैं
उन्हें आपकी रहम याद दिलाने वास्ते
कुछ रोटी के टुकड़े अता करना चाहता हूँ
आपकी इजाज़त हो तो अपनी मर्ज़ी से
एक छोटा सा गुनाह करना चाहता हूँ


जिन लाशों से आपको बू आती है
जिनके मुँह से निकल रही है चीटियों की कतार
जिनपर बेकरार हैं कौवे
उन्हें फेंकने से पहले
उनपर रोने वाले परिवार का पता करना चाहता हूँ
बस ज़रा सा वक़्त दीजिये
मैं जल्द से जल्द गुनाह करना चाहता हूँ


फिर चाहे ढक दीजियेगा कानूनी दफाओं से
और चबा-चबा कर पढ़ियेगा अदालत में
मेरी इस हिमाक़त की सज़ा
मेरी मुट्ठी से छीन कर , आपने मुझे नमक दिया था
मैं उसका भी हक़ अदा करना चाहता हूँ
मगर उससे पहले
बड़े हक़ से , मैं गुनाह करना चाहता हूँ

'विपुल'












Monday, June 22, 2020

किसानी कलंक नहीं

कल रात भर तड़पता रहा
मर गया तेरा बापू आज
बांध लें अंगोछि सर पे
संभालेगा तू घर के काम-काज

न हो इन हाथों को नसीब कलम कभी
पड़ेगा इन पर हल का छाला
तैयार रखती हूं बैलों को तब तक
जा अपनी किताबें बहा ला

इस पेट की खातिर
बार बार तुझे मरना पड़ेगा
दुख से कहती हूं तो क्या
संघर्ष तुझे करना पड़ेगा

बना ले बैलों को मित्र अपना
छोड़ ये अफसर का सपना
बस चलता जा , चलने की सोच
पकड़ ले इन हाथों से फरुहे
न इन्हें मलने की सोच

देख न बरखा बार बार तू
सींच दे क्षेत्र पसीने से
संघर्ष का जीवन बेहतर है
रो रोकर जीने से

खड़ा न कोई राह पर तेरे संग
सुनेगा ना कोई तेरी चीख
लड़खड़ाते हैं कदम तो क्या
खुद के पैरों पर खड़ा होना सीख

अब यही है तेरी दुनिया
खुशी से कर इसका संबोधन
कत्ल कर इच्छाओं का अपने
छोड़ यह निरार्थ रुदन

ईमान का हाथ थामे
कलंक न समझना किसानी को
चूल्हा जलाना तो ज़रूर
मगर आग न बनाना बेईमानी को

मत रो बापू के लिए तू अब
नम न होने दे ये आँखें
यकीन कर बस कर्म पर अपने
बाकि आगे भगवान राखे

पोछ दी मैंने मांग अपनी
तू भी अब मुड़वा ले मूछें
शराब पीकर मरा बापू तेरा
खुशी से बताना यदि कोई पूछे

'विपुल'

Tuesday, March 31, 2020

गज़ल

ख़ुद को इतने घाव देकर ये इल्म सीखा था ,
कमबख्त ! जान मांगे बगैर चला गया 

कभी महखाने में शाम गुज़ारो , तो मालूम हो ,
कैसे भुलाया तुम्हें , कैसे ये दिल किसी और पे आ गया 

काश ! तू ख़ुद छोड़ कर जाती हमें साक़ी के दरवाज़े तक ,
तो हम ये कह पाते , जाते जाते किसी वफ़ादार से मिला गया 

तुझे याद करके आज भी तकमील होते हैं हम ,
अच्छा हुआ , जो ज़िंदगी से बेवफ़ा गया

हाँ वो खत मैंने लिखे हैं मगर तुम्हारे लिए नहीं ,
डाकिये की आदत थी , जो तुम्हारे पते पर चला गया

किसने कहा हम जंग से खौफ़ खाते थे ,
ख़ुदा की मर्ज़ी थी सो मैं भूख से मारा गया

 ये पर कट जाने का डर , हाय !
परिंदा ख़ुद ज़मी पे आ गया 
                                                     - विपुल
   
                                                

Wednesday, March 18, 2020

आशिक़ हूँ , मांग कर देख

न  चाँद की चूड़ी , न रात का काजल , न झूठे ख्वाब दूंगा 
आशिक़ हूँ , मांग कर देख , मुहब्बत बेहिसाब दूंगा 


न वो रेशमी लिबास , न बरेली का झुमका , न शायराना जवाब दूंगा 
आशिक़ हूँ , मांग कर देख , मुहब्बत बेहिसाब दूंगा 


न हीरों का हार , न केसर की लाली , न पीने को नशीली शराब दूंगा 
आशिक़ हूँ , मांग कर देख ,मुहब्बत बेहिसाब दूंगा 


न कालीन बिछी ज़मीं , न चमचमाती दीवारें , न काटों से बचने वाली जुराब दूंगा 
आशिक़ हूँ , मांग कर देख , मुहब्बत बेहिसाब दूंगा 


न कन्नौज का इत्र , न बनारस का पान , न बालों में लगाने को गुलाब दूंगा 
आशिक़ हूँ , मांग कर देख  , मुहब्बत बेहिसाब दूंगा 


न सोने की कर्धन , न राज सिंघासन , न मशहूर करने वाला खिताब दूंगा 
आशिक़ हूँ , मांग कर देख , मुहब्बत बेहिसाब दूंगा 





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Wednesday, March 11, 2020

QUIT TOBACCO (ad script)

[ HEAVY BARITONE VOICE] :
BADI BEFIKRI SE PITAJI HAR ROZ AKHBAAR PADHTE HAIN

MAMMI JI AAJ BHI BADI BESABRI SE ACHAAR DAALTI HAIN

ARREY ! KANPUR WALE CHACHA NE TO ZID PAKAD LI THI …….PHIR BHI PITAJI NE RINKI KO COACHING KE LIYE BAAHAR BHEJA

KYON ! KYONKI RAVI HAI NA

MAGAR RUKIYE…..RAVI!

RAVI TO KHUD KO DHUE MEIN UDAA RAHA HAI...........RAVI KE PHEPHDE AUR ZINGADI , DONO PAR AB TAMBAAKHU KA KABZA HAI
KHUD KE LIYE NAA SAHI KAM SE KAM APNO KE LIYE TO TAMBAAKHU CHHODIYE......AAKHIR AAPKE SAATH AAPKE APNE BHI TO JEE RAHE HAIN

TAMBHAAKHU AAJ HI CHHODEN.............KYONKI APNI ZINDAGI , APNO KE LIYE

(adhik jaankari ke liye xxxxxxxxxx number par miss call dijiye)





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BMW CARS AD SCRIPT FOR LUXURY SEDAN SEGMENT


SOUND:
(various sound effects)

VOICE:
why would you ride a BMW ?

not just because you are obsessed with luxurious interiors
not just because you are conscious about CO2 emissions
not just because you need a powerful companion

not just because you wanna feel the impulse of modern high life

not just because you wanna witness the evolution

not just because you want your bucks to be valued you will ride it all for a BMW

BMW , RIDE IT ALL FOR A BMW



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Sunday, January 19, 2020

ग़ज़ल

ज़रूरी है कहानी को फिर समझना
कहानी में क़िरदार बहुत हैं
कत्ल से तौबा भूल जाओ
अब कत्ल के भी दावेदार बहुत हैं

कभी इस शहर में दूर दूर से नमाज़ी आते थे
वक़्त ने ज़िद की ऐसी की आज यहां कारागार बहुत हैं

हमने क़ुतुब खाने में काफ़ी वक़्त ज़ाया करके देख लिया
यहां हुक्मरानों की फ़रमाइश पर लिखे अशआ'र बहुत हैं

हम हुजरे में बैठ उनसे इज़हार-ए-मोहब्बत करते
कमबख्त महबूबा को तो पसंद मीनार बहुत हैं

अबे यार ! खुदा के लिए कलम को गरियाना छोड़ दो
गुनाह हमारा है , हम ही दिल-ए-ज़ार बहुत हैं

अब व्हाट्सएप पर लिखे मैसेज काफ़ी नहीं लगते
कभी भरे बाज़ार आकर चूम लो गर प्यार बहुत है
  

                                                                          विपुल 

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sabab ishq ka jano magar , deewane ka haal zarur puchho

परिंदो को ता उम्र दरख़्त से मुहब्बत थी 
हमें लगा बाग़ में दाने को आते हैं 

शहर का धुंआ घोटने से अच्छा था ,
गाँव की धुल फांकता 
ख्याल बना रहता है , हम कारखाने को जाते हैं 

अब और खत में कितनी जान डाल पाता मैं 
जाने दिया उन्हें , जो जाने को आते हैं 
          
                                               विपुल 



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आखिर आदत लग गई

हमने तोहफे में घडी क्या दे दी 
वक्त जाने की उन्हें आदत लग गयी 

तरस खाकर घर में पनाह दी थी 
किरायदारों को छत की आदत लग गयी 

 कभी घर जाने का इंतज़ार हम भी करते थे
न जाने कब  पेट पालने की आदत लग गयी  

तेरी  औकात से वाकिफ़ थे , फिर भी गुलाब दिया 
अफ़सोस ! तुम्हे तलवार रखने की आदत लग गयी 

ये सच है कि  तुमसे बिछड़कर हमने रातों अचकनें भिगोई हैं 
बेजान हो गए थे , न जाने कब चिल्लम की आदत लग गयी 
                                  
                                                                 विपुल 


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मसला क्या है


जो आज तुमसे इतनी नफ़रत करने लगा हूँ
मालूम होता है , प्यार गज़ब का था ।
कभी कभी मन होता है
चलो ढूंढ निकालें उस शख़्स को
जिसने मेरे इज़हार का जवाब
अपनी आंखें मूंदकर दिया था ।



दरअसल बहुत दिन हो गए हैं
तुमसे मिले
काफ़ी दिनों से टेबल पर
तुम्हारा दुपट्टा रखा नहीं मिलता ।
अब वो छोटी चिट्ठियां भी नहीं मिलतीं
जिनमें दवा समय पर खाने की
चेतावनी लिखी होती थी ।

तो फिर मसला क्या है ?
आखिर क्यों चीजें
अंत की ओर बढ़ने को बेताब हो चली हैं ?

मेरे मुहाने पर इन्हें
कौन सा सृजन नज़र आ रहा है
जो ये किसी का पीछा करता
नज़र आ रही हैं ।

घड़ी की सुई से लड़ लिया है तुमने ,
शायद शाम तुमको अटती नहीं है ।
आखिर क्या हुआ जो रोज़
ऑफिस से लौटते तुमने
बाज़ार जाने का मन बना लिया ।

मैंने देखा है
तुमने दिन के चौबीस घंटों को
सिर्फ चौबीस घंटे में
कैसे बदल दिया है ।

मगर देखना कहीं
ज़्यादा इशकबाज़ न बन जाना
हर किसी को कहां पसंद
उसके आसपास हर वक़्त घूमती
नादान लड़की
हर वक़्त आपको ढक देने वाली
कभी बालों से , कभी सवालों से ।

वो तुम्हारे होठों के करीब आने की कोशिश
ज़रूर करेगा
मगर यकीन मानों उस वक़्त
इस जिस्म के खेल के दौरान
तुम्हारी नज़रें पुराने खिलाड़ी को
दाद देने को बौखलाएंगी

हाँ भूख भी अलग है सबकी ,
जिसकी जैसी भूख ।
मेरी भूख शायद ही खत्म हो .........मौत से उम्मीद अभी भी बाकी है ।

'विपुल'


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बस सीख लिया !

अपनों के साथ पराया रहने से अच्छा था
परायों के साथ रहना सीख लिया

आखिर छुट्टियों में कितना बहला पाता गाँव को
शहर की आब-ओ-हवा में रहना सीख लिया

इक अर्से से इमारत बुनियाद से मिलना चाहती है
हद हुई ! सो ढहना सीख लिया

आस पास हसीनाओं की गिनती कम है ?
बस यूं समझो , हमने कहना सीख लिया
                       
                              'विपुल'


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Ghazal

आखिर वो कौन था , जो तुमसे मिलकर हारा नहीं, काफी है सूखी रोटी पेट को, नमक बगैर जखम का गुज़ारा नहीं। उसने बड़ी शिद्दत से लौटाया इश्क, बड़ी शिद्दत...