परिंदो को ता उम्र दरख़्त से मुहब्बत थी
हमें लगा बाग़ में दाने को आते हैं
शहर का धुंआ घोटने से अच्छा था ,
गाँव की धुल फांकता
ख्याल बना रहता है , हम कारखाने को जाते हैं
अब और खत में कितनी जान डाल पाता मैं
जाने दिया उन्हें , जो जाने को आते हैं
विपुल
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