Saturday, May 7, 2022

गज़ल

गलती तुम्हारी जो इतनी जल्दी हौसला सींचते हो
सामनेवाला तो बस मन बहला रहा था 

मैं आज भी अपनी आशिक़ी पर नाज़ करता हूँ
आखिर मैं हारा भी तो जिस्म के खेल में हारा था 

नादान हँसते हैं मुझपर कि मैंने आँखें बंद रखीं
उन्हें क्या पता मैं किस कदर रिस्ता निभा रहा था 

मौत की जल्दी इसीलिए कि उसे ये दिखा सके
दम तोड़ते हमने उसका नाम नहीं पुकारा था 

अब इससे ज़्यादा इश्क़ में और कितना डूबें भला
मुशायरों में बस उसी को याद किये जा रहा था 

उसका हुनर रहा है, धोखा मत खाओ विपुल
वो रोया नहीं बस तुम्हें आंसू दिखा रहा था 

बस इसीलिए मैं ऊपरवाले को भला नहीं समझता
वो तब लौटा जब मैं उसकी तस्वीर जला रहा था

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Ghazal

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