Sunday, January 19, 2020

ग़ज़ल

ज़रूरी है कहानी को फिर समझना
कहानी में क़िरदार बहुत हैं
कत्ल से तौबा भूल जाओ
अब कत्ल के भी दावेदार बहुत हैं

कभी इस शहर में दूर दूर से नमाज़ी आते थे
वक़्त ने ज़िद की ऐसी की आज यहां कारागार बहुत हैं

हमने क़ुतुब खाने में काफ़ी वक़्त ज़ाया करके देख लिया
यहां हुक्मरानों की फ़रमाइश पर लिखे अशआ'र बहुत हैं

हम हुजरे में बैठ उनसे इज़हार-ए-मोहब्बत करते
कमबख्त महबूबा को तो पसंद मीनार बहुत हैं

अबे यार ! खुदा के लिए कलम को गरियाना छोड़ दो
गुनाह हमारा है , हम ही दिल-ए-ज़ार बहुत हैं

अब व्हाट्सएप पर लिखे मैसेज काफ़ी नहीं लगते
कभी भरे बाज़ार आकर चूम लो गर प्यार बहुत है
  

                                                                          विपुल 

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