अपनों के साथ पराया रहने से अच्छा था
परायों के साथ रहना सीख लिया
आखिर छुट्टियों में कितना बहला पाता गाँव को
शहर की आब-ओ-हवा में रहना सीख लिया
आखिर वो कौन था , जो तुमसे मिलकर हारा नहीं, काफी है सूखी रोटी पेट को, नमक बगैर जखम का गुज़ारा नहीं। उसने बड़ी शिद्दत से लौटाया इश्क, बड़ी शिद्दत...
No comments:
Post a Comment