जो आज तुमसे इतनी नफ़रत करने लगा हूँ
मालूम होता है , प्यार गज़ब का था ।
कभी कभी मन होता है
चलो ढूंढ निकालें उस शख़्स को
जिसने मेरे इज़हार का जवाब
अपनी आंखें मूंदकर दिया था ।
दरअसल बहुत दिन हो गए हैं
तुमसे मिले
काफ़ी दिनों से टेबल पर
तुम्हारा दुपट्टा रखा नहीं मिलता ।
अब वो छोटी चिट्ठियां भी नहीं मिलतीं
जिनमें दवा समय पर खाने की
चेतावनी लिखी होती थी ।
तो फिर मसला क्या है ?
आखिर क्यों चीजें
अंत की ओर बढ़ने को बेताब हो चली हैं ?
मेरे मुहाने पर इन्हें
कौन सा सृजन नज़र आ रहा है
जो ये किसी का पीछा करता
नज़र आ रही हैं ।
घड़ी की सुई से लड़ लिया है तुमने ,
शायद शाम तुमको अटती नहीं है ।
आखिर क्या हुआ जो रोज़
ऑफिस से लौटते तुमने
बाज़ार जाने का मन बना लिया ।
मैंने देखा है
तुमने दिन के चौबीस घंटों को
सिर्फ चौबीस घंटे में
कैसे बदल दिया है ।
मगर देखना कहीं
ज़्यादा इशकबाज़ न बन जाना
हर किसी को कहां पसंद
उसके आसपास हर वक़्त घूमती
नादान लड़की
हर वक़्त आपको ढक देने वाली
कभी बालों से , कभी सवालों से ।
वो तुम्हारे होठों के करीब आने की कोशिश
ज़रूर करेगा
मगर यकीन मानों उस वक़्त
इस जिस्म के खेल के दौरान
तुम्हारी नज़रें पुराने खिलाड़ी को
दाद देने को बौखलाएंगी
हाँ भूख भी अलग है सबकी ,
जिसकी जैसी भूख ।
मेरी भूख शायद ही खत्म हो .........मौत से उम्मीद अभी भी बाकी है ।
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