ख़ुद को इतने घाव देकर ये इल्म सीखा था ,
कमबख्त ! जान मांगे बगैर चला गया
कभी महखाने में शाम गुज़ारो , तो मालूम हो ,
कैसे भुलाया तुम्हें , कैसे ये दिल किसी और पे आ गया
काश ! तू ख़ुद छोड़ कर जाती हमें साक़ी के दरवाज़े तक ,
तो हम ये कह पाते , जाते जाते किसी वफ़ादार से मिला गया
तुझे याद करके आज भी तकमील होते हैं हम ,
अच्छा हुआ , जो ज़िंदगी से बेवफ़ा गया
हाँ वो खत मैंने लिखे हैं मगर तुम्हारे लिए नहीं ,
डाकिये की आदत थी , जो तुम्हारे पते पर चला गया
किसने कहा हम जंग से खौफ़ खाते थे ,
ख़ुदा की मर्ज़ी थी सो मैं भूख से मारा गया
ये पर कट जाने का डर , हाय !
परिंदा ख़ुद ज़मी पे आ गया
- विपुल
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