जब तेरे दर्द को लिखने पर खत्म हो जाए मेरी सियाही
जब लोकतंत्र की आड़ में चल रही हो राजशाही
ऐसी गली व्यवस्था से इंकार होना चाहिए
........और गर हो न ऐसा
तो मुझे ख़ुद पर धिक्कार होना चाहिए
जब तेरे हक की न मांगू मैं दुआएं
जब इकलौती डिबरी भी तेरे घर की बुझ जो जाए
तब मेरी किस्मत में न कोई खुशी न त्यौहार होना चाहिए
........और गर हो न ऐसा
तो मुझे ख़ुद पर धिक्कार होना चाहिए
जो तेरे दर्द बयाँ करने का प्रयास कर रहा हो
जो तेरी आँख भर आने पर ख़ुद मर रहा हो
मेरा क़ुरान ,मेरा रामायण वो अखबार होना चाहिए
........और गर हो न ऐसा
तो मुझे ख़ुद पर धिक्कार होना चाहिए
जो तेरी मेरी नफ़रत के बीच राजनीति चमकाए
हमारी हज़ार आह पर जिसका ज़मीर चकनाचूर न हो जाए
ऐसा न संसद धाम में मौजूद कोई मक्कार होना चाहिए
........और गर हो न ऐसा
तो मुझे ख़ुद पर धिक्कार होना चाहिए
जो मुझे अय्याशी की चमक भा रही हो
जो मौजूद रहूँ मैं उस कोठे में जहाँ तेरी बेटी नाच गा रही हो
तेरी लाश पर टिका न कोई ऐसा मेला या बाज़ार होना चाहिए
........और गर हो न ऐसा
तो मुझे ख़ुद पर धिक्कार होना चाहिए
जब तेरे घाव पर मरहम करते , मेरी जात बीच में आ जाए
जब तेरे शहीद होने पर ये विपुल संवेदनहीन हो जाए
ऐसा न कोई दिन या लम्हा भी एक बार होना चाहिए
........और गर हो न ऐसा
तो मुझे ख़ुद पर धिक्कार होना चाहिए
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