Sunday, January 19, 2020

ग़ज़ल

ज़रूरी है कहानी को फिर समझना
कहानी में क़िरदार बहुत हैं
कत्ल से तौबा भूल जाओ
अब कत्ल के भी दावेदार बहुत हैं

कभी इस शहर में दूर दूर से नमाज़ी आते थे
वक़्त ने ज़िद की ऐसी की आज यहां कारागार बहुत हैं

हमने क़ुतुब खाने में काफ़ी वक़्त ज़ाया करके देख लिया
यहां हुक्मरानों की फ़रमाइश पर लिखे अशआ'र बहुत हैं

हम हुजरे में बैठ उनसे इज़हार-ए-मोहब्बत करते
कमबख्त महबूबा को तो पसंद मीनार बहुत हैं

अबे यार ! खुदा के लिए कलम को गरियाना छोड़ दो
गुनाह हमारा है , हम ही दिल-ए-ज़ार बहुत हैं

अब व्हाट्सएप पर लिखे मैसेज काफ़ी नहीं लगते
कभी भरे बाज़ार आकर चूम लो गर प्यार बहुत है
  

                                                                          विपुल 

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sabab ishq ka jano magar , deewane ka haal zarur puchho

परिंदो को ता उम्र दरख़्त से मुहब्बत थी 
हमें लगा बाग़ में दाने को आते हैं 

शहर का धुंआ घोटने से अच्छा था ,
गाँव की धुल फांकता 
ख्याल बना रहता है , हम कारखाने को जाते हैं 

अब और खत में कितनी जान डाल पाता मैं 
जाने दिया उन्हें , जो जाने को आते हैं 
          
                                               विपुल 



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आखिर आदत लग गई

हमने तोहफे में घडी क्या दे दी 
वक्त जाने की उन्हें आदत लग गयी 

तरस खाकर घर में पनाह दी थी 
किरायदारों को छत की आदत लग गयी 

 कभी घर जाने का इंतज़ार हम भी करते थे
न जाने कब  पेट पालने की आदत लग गयी  

तेरी  औकात से वाकिफ़ थे , फिर भी गुलाब दिया 
अफ़सोस ! तुम्हे तलवार रखने की आदत लग गयी 

ये सच है कि  तुमसे बिछड़कर हमने रातों अचकनें भिगोई हैं 
बेजान हो गए थे , न जाने कब चिल्लम की आदत लग गयी 
                                  
                                                                 विपुल 


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मसला क्या है


जो आज तुमसे इतनी नफ़रत करने लगा हूँ
मालूम होता है , प्यार गज़ब का था ।
कभी कभी मन होता है
चलो ढूंढ निकालें उस शख़्स को
जिसने मेरे इज़हार का जवाब
अपनी आंखें मूंदकर दिया था ।



दरअसल बहुत दिन हो गए हैं
तुमसे मिले
काफ़ी दिनों से टेबल पर
तुम्हारा दुपट्टा रखा नहीं मिलता ।
अब वो छोटी चिट्ठियां भी नहीं मिलतीं
जिनमें दवा समय पर खाने की
चेतावनी लिखी होती थी ।

तो फिर मसला क्या है ?
आखिर क्यों चीजें
अंत की ओर बढ़ने को बेताब हो चली हैं ?

मेरे मुहाने पर इन्हें
कौन सा सृजन नज़र आ रहा है
जो ये किसी का पीछा करता
नज़र आ रही हैं ।

घड़ी की सुई से लड़ लिया है तुमने ,
शायद शाम तुमको अटती नहीं है ।
आखिर क्या हुआ जो रोज़
ऑफिस से लौटते तुमने
बाज़ार जाने का मन बना लिया ।

मैंने देखा है
तुमने दिन के चौबीस घंटों को
सिर्फ चौबीस घंटे में
कैसे बदल दिया है ।

मगर देखना कहीं
ज़्यादा इशकबाज़ न बन जाना
हर किसी को कहां पसंद
उसके आसपास हर वक़्त घूमती
नादान लड़की
हर वक़्त आपको ढक देने वाली
कभी बालों से , कभी सवालों से ।

वो तुम्हारे होठों के करीब आने की कोशिश
ज़रूर करेगा
मगर यकीन मानों उस वक़्त
इस जिस्म के खेल के दौरान
तुम्हारी नज़रें पुराने खिलाड़ी को
दाद देने को बौखलाएंगी

हाँ भूख भी अलग है सबकी ,
जिसकी जैसी भूख ।
मेरी भूख शायद ही खत्म हो .........मौत से उम्मीद अभी भी बाकी है ।

'विपुल'


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बस सीख लिया !

अपनों के साथ पराया रहने से अच्छा था
परायों के साथ रहना सीख लिया

आखिर छुट्टियों में कितना बहला पाता गाँव को
शहर की आब-ओ-हवा में रहना सीख लिया

इक अर्से से इमारत बुनियाद से मिलना चाहती है
हद हुई ! सो ढहना सीख लिया

आस पास हसीनाओं की गिनती कम है ?
बस यूं समझो , हमने कहना सीख लिया
                       
                              'विपुल'


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Ghazal

आखिर वो कौन था , जो तुमसे मिलकर हारा नहीं, काफी है सूखी रोटी पेट को, नमक बगैर जखम का गुज़ारा नहीं। उसने बड़ी शिद्दत से लौटाया इश्क, बड़ी शिद्दत...