Wednesday, December 19, 2018

मुझे खुद पर धिक्कार होना चाहिए

जब तेरे दर्द को लिखने पर खत्म हो जाए मेरी सियाही
जब लोकतंत्र की आड़ में चल रही हो राजशाही
ऐसी गली व्यवस्था से इंकार होना चाहिए 
........और गर हो न ऐसा
तो मुझे ख़ुद पर धिक्कार होना चाहिए


जब तेरे हक की न मांगू मैं दुआएं
जब इकलौती डिबरी भी तेरे घर की बुझ जो जाए
तब मेरी किस्मत में न कोई खुशी न त्यौहार होना चाहिए
........और गर हो न ऐसा
तो मुझे ख़ुद पर धिक्कार होना चाहिए


जो तेरे दर्द बयाँ करने का प्रयास कर रहा हो
जो तेरी आँख भर आने पर ख़ुद मर रहा हो
मेरा क़ुरान ,मेरा रामायण वो अखबार होना चाहिए
........और गर हो न ऐसा
तो मुझे ख़ुद पर धिक्कार होना चाहिए


जो तेरी मेरी नफ़रत के बीच राजनीति चमकाए
हमारी हज़ार आह पर जिसका ज़मीर चकनाचूर न हो जाए
ऐसा न संसद धाम में मौजूद कोई मक्कार होना चाहिए
........और गर हो न ऐसा
तो मुझे ख़ुद पर धिक्कार होना चाहिए


जो मुझे अय्याशी की चमक भा रही हो
जो मौजूद रहूँ मैं उस कोठे में जहाँ तेरी बेटी नाच गा रही हो
तेरी लाश पर टिका न कोई ऐसा मेला या बाज़ार होना चाहिए
........और गर हो न ऐसा
तो मुझे ख़ुद पर धिक्कार होना चाहिए


जब तेरे घाव पर मरहम करते , मेरी जात बीच में आ जाए
जब तेरे शहीद होने पर ये विपुल संवेदनहीन हो जाए
ऐसा न कोई दिन या लम्हा भी एक बार होना चाहिए
........और गर हो न ऐसा
तो मुझे ख़ुद पर धिक्कार होना चाहिए


PING ME THROUGH FOLLOWING: 
COPYRIGHT RESERVED . AUTHOR'S CONSENT  REQUIRED .

Sunday, December 2, 2018

सुनों यह ज़मीन क्या कहती है ?

 

हे! महामायावी मोदीजी आपसे यथासंभव विनम्रता के साथ , हाथ जोड़कर अपने कंकड़ कंकड़ को आपके चरणों मे समर्पित करके एक निवेदन करती हूँ कि मेरे  गाँव के किसान को जितनी जल्दी हो सके वापस भेज दो । जबसे वह गया है रात दिन डर के साए में गुज़रते हैं कि कहीं तुम्हारी लुटियों , माफ़ कीजिये लुट्येन्स की दिल्ली में काम कर रहे गार्ड की नौकरी उसे पसंद न आ जाए । अगर ऐसा हो गया तो मुझे कौन अपने फावड़े से गुद-गुदएगा , कौन मेरी प्यास पर अपने आँसू बहाएगा ? बताओ न कौन जाएगा नंगे पाँव बाज़ार तक और मुन्ने की मिठाई का पैसा मेरी ख़ुराक पर लुटाएगा , बताओ न किसके बच्चे मेरी गोद में खेल कर सच में मुझे माँ होने का एहसास दिलाएंगे ?

मैं जानती हूँ मैंने आज फर्टिलाइज़र की लत लगा ली है और मैं उसे खाने भर भी फसल ऊगा कर नहीं दे सकती तो मुनाफ़ा तो सपना ही ठहरा । मगर क्या करूँ आज  अपनी हरियाली पर गर्व नहीं डर होता है कि कहीं यह पौधे बड़े पेड़ न बन जाएं जिन्हें देख उसे फाँसी का ख्याल आ जाता है और इसी तरह मैं अपने सारे बच्चों को खो दूँ।

बहुत भोला है वो । उसे ख़ुद के लिए कुछ नहीं चाहिए बस वो तो चाहता है कि उसके मुन्ने , उसकी मुन्नी का बस्ता किताबों के बग़ैर हल्का न हो जाए , जो बची हुई नथिनी से उसकी मेहरारु उसके अंदर रति जगाती है , कहीं उसे भी सहकारी बैंक वाले छीन कर न ले जाएं ।कहीं उसकी गाय भी भूख के मारे दम न तोड़ दे और गौ हत्या के पाप से अपने पूर्वजों की आत्मा की शांति को वह उथल पुथल न कर दे । इसके बाप परदादाओं को बरसों से देखते आ रहीं हूँ , यह परिवार हमेशा से गरीबी में जीता आ रहा है , क्या अब भी इसके दिन नहीं बदलेंगे ? भगवान की लाज रखना और यह बिल्कुल मत कहना कि इसे अपनी गरीबी दूर करने के लिए संसद में बैठना पड़ेगा । गाँव का आदमी है न ! इसीलिए इसे मंदिर में कीर्तन देखने की आदत है , हंगामा नहीं । ना बाबा ना मैं तो इस चीज़ के लिए कभी राज़ी नहीं होउंगी । क्या पता ? कल को ये भी तुम्हारी तरह सालों पंखेदार विमानों में घूम कर आकाश की सैर करे और चुनाव आने पर कहे कि मुझे तो मेरी माँ , मेरी ज़मीन ने बुलाया है ।




PING ME THROUGH FOLLOWING: 
COPYRIGHT RESERVED . AUTHOR'S CONSENT  REQUIRED .

Ghazal

आखिर वो कौन था , जो तुमसे मिलकर हारा नहीं, काफी है सूखी रोटी पेट को, नमक बगैर जखम का गुज़ारा नहीं। उसने बड़ी शिद्दत से लौटाया इश्क, बड़ी शिद्दत...