जब देखा मैंने मशीहा को ही अपने रहमों करम का हिसाब देते
एक गुलाब को मालि की फरमाइश पर खुसबू और आब देते
तुम मेरे ज़हन पर मानो छा ही गए
मुक्तिबोध आखिर तुम याद आ ही गए
जब श्रीयुत के हक़दार एलियट नहीं गुंडे हो गए
जब आजानुभुज अपनी लाचारी पर रो गए
जब जिस्म की नीलामी देख भी चौकीदार सो गए
तुम मेरे ज़हन पर मानों छा ही गए
मुक्तिबोध आखिर तुम याद आ ही गए
जब देखा मैंने क़ानून के पन्नों को हवा में उछलते
जब देखा मिलॉड को मुज़रिम के साथ चलते
खुद को बंद कमरे में बड़बड़ाते
तुम मेरे ज़हन पर मानों छा ही गए
मुक्तिबोध आखिर तुम याद आ ही गए
जब गाँव में दिवाली पर दिये नहीं फांसी के फंदे दिखने लगे
जब हज़ारों मुन्नी और बिरजु चिल्लाने चीखने लगे
जब डी एम , तहसीलदार कौड़ी के भाव बिकने लगे
तुम मेरे ज़हन पर मानों छा ही गए
मुक्तिबोध आखिर तुम याद आ ही गए
सुना है तुम्हारा ठिकाना बदल गया है
चलो मान ली ये बात भी
मगर क्या तुमने लिखना छोड़ दिया है ?
ये तो तुम्हारे बस की बात ही नहीं।
तो ! तो फिर सुनाओ ना उस उपरवाले को एकाद कविताएं
धिक्कारो , धिक्कारो उसे कि
एक दिन हो ऐसा
की मंदिर मस्जिद से हज़ारों कोतवाल निकल आएं
जिन्हें नापसंद हों गरीबों और कुचलों के आँसू

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