Saturday, May 7, 2022
गज़ल
Wednesday, February 9, 2022
गज़ल
वो गज़लें किसी और को सुनाने लगे
लो हम आखिर उन्हें भुलाने लगे
इस तरह तो आँखें सूख जातीं
देर सही , कुछ दर्द ठिकाने लगे
जो लोग रखते थे जूनून की
न जाने कितनी मिसालें
मेरे इक अदने सवाल पर
अपनी उम्र बताने लगे
मैंने हँसने वालों की थकान
करीब से देखी है
बस खुदा करे ये आँसू
वापस आने लगें
तोहफ़े खातिर पैसे बचाए
मगर डर नोटबंदी का
सो बस अब उन पैसों से
रकीबों को चाय पिलाने लगे
रईसों के बच्चे थक चुके थे
हर चीज़ को पाकर
कमी महसूस करनी थी
तो उसकी गली को जाने लगे
वो इक पल नाराज़ होती
और अगले पल मान जाती
मगर अब रूठी रहती है
जो उसे ग़ैर मनाने लगे
दिल हार चुका था सब लेकिन
हारता कैसे उम्मीदें
जरूर होगा ऐसा कि
मेरी सिस्कियाँ उसके शहर जाने लगें
नायाब की ख़्वाइश तो
कबकी घोंट गए हम
ज़िंदा रहने को ज़रूरी था
सो बस दिल बहलाने लगे
उम्र काट तन्हाई की
होंगे हम दोनों फिर तनहा
इंतज़ार उस वक़्त का तबतक
दुनिया को झूठ दिखाने लगे
विपुल
Ghazal
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