धुएं में धुवां नहीं साँसें खोजो
शहर का हर शख़्स ही धुएं में पला है
रोकने की ज़िद में याद आने लगती है
अब जब मुसाफिर टपकती छत छोड़ चला है
मैंने तो कबका भुला दिया,लोगों के कहे पे याद है
है हज़ारों का कातिल मगर आदमी भला है
मैंने कुछ और सोच कर साकी का हाथ थामा था
यहाँ तो बस जाम गिनने का मुकाबला है
हाकिम और रंगरेज़ के हुनर को एक मानों
घाव ठीक करना और रंग देना, दोनों ही कला है
लिख तो लिया मगर उसे सुनाएं कैसे
कल भी एक मसला था , आज भी मसला है
- विपुल