Sunday, September 5, 2021

ग़ज़ल

धुएं में धुवां नहीं  साँसें  खोजो

शहर का हर शख़्स ही धुएं में पला है 


रोकने की ज़िद में याद आने लगती है

अब जब मुसाफिर टपकती छत छोड़ चला है 


मैंने तो कबका भुला दिया,लोगों के कहे पे याद है 

है हज़ारों का कातिल मगर आदमी भला है 


मैंने कुछ और सोच कर साकी का हाथ थामा था 

यहाँ तो बस जाम गिनने का मुकाबला है 


हाकिम और रंगरेज़ के हुनर को एक मानों

घाव ठीक करना और रंग देना, दोनों ही कला है 

 

लिख तो लिया मगर उसे सुनाएं कैसे 

कल भी एक मसला था , आज भी मसला है  

                                                          - विपुल 

                                                     

                                              



 

Ghazal

आखिर वो कौन था , जो तुमसे मिलकर हारा नहीं, काफी है सूखी रोटी पेट को, नमक बगैर जखम का गुज़ारा नहीं। उसने बड़ी शिद्दत से लौटाया इश्क, बड़ी शिद्दत...