Thursday, August 27, 2020

क्या रक्खा है !

मज़ा तो तब जब तुम्हारे बाल संवारते सुनाएँ
वगरना ग़ज़ल सुनाने में क्या रक्खा है

मुझे अपनी किस्मत से वफ़ा की उम्मीद नहीं
तुझे खोने के डर से इकरार को दबा रक्खा है

आइना होगा तो उम्र पर हँसेगा सो पटक दिया
हमने इसी बेपरवाही से ख़ुद को जवां रक्खा है

अदालत की कार्रवाई ! मियाँ मज़ाक छोड़ो
मेरे गुनाह से पहले तैयार फैसला रक्खा है

तेरा ज़िक्र छेड़ने से ख़ुद को रोक नहीं पाते
ये तुमने हमें क्या सिखा रक्खा है

हवाओं के बदलने का इंतज़ार कमज़ोरों को था
हमने तो ख़ुद ही कबसे दिया बुझा रक्खा है

तू नहीं तो अब वो घड़ी मिले
जिसमें तेरी आँखों का मज़ा रक्खा है

कोई है मेरे अंदर जिसे तेरे लौटने की उम्मीद है
इसी उम्मीद पर सबको , तेरा चेहरा बता रक्खा है

             
                                                         -  विपुल

Ghazal

आखिर वो कौन था , जो तुमसे मिलकर हारा नहीं, काफी है सूखी रोटी पेट को, नमक बगैर जखम का गुज़ारा नहीं। उसने बड़ी शिद्दत से लौटाया इश्क, बड़ी शिद्दत...