Monday, June 22, 2020

किसानी कलंक नहीं

कल रात भर तड़पता रहा
मर गया तेरा बापू आज
बांध लें अंगोछि सर पे
संभालेगा तू घर के काम-काज

न हो इन हाथों को नसीब कलम कभी
पड़ेगा इन पर हल का छाला
तैयार रखती हूं बैलों को तब तक
जा अपनी किताबें बहा ला

इस पेट की खातिर
बार बार तुझे मरना पड़ेगा
दुख से कहती हूं तो क्या
संघर्ष तुझे करना पड़ेगा

बना ले बैलों को मित्र अपना
छोड़ ये अफसर का सपना
बस चलता जा , चलने की सोच
पकड़ ले इन हाथों से फरुहे
न इन्हें मलने की सोच

देख न बरखा बार बार तू
सींच दे क्षेत्र पसीने से
संघर्ष का जीवन बेहतर है
रो रोकर जीने से

खड़ा न कोई राह पर तेरे संग
सुनेगा ना कोई तेरी चीख
लड़खड़ाते हैं कदम तो क्या
खुद के पैरों पर खड़ा होना सीख

अब यही है तेरी दुनिया
खुशी से कर इसका संबोधन
कत्ल कर इच्छाओं का अपने
छोड़ यह निरार्थ रुदन

ईमान का हाथ थामे
कलंक न समझना किसानी को
चूल्हा जलाना तो ज़रूर
मगर आग न बनाना बेईमानी को

मत रो बापू के लिए तू अब
नम न होने दे ये आँखें
यकीन कर बस कर्म पर अपने
बाकि आगे भगवान राखे

पोछ दी मैंने मांग अपनी
तू भी अब मुड़वा ले मूछें
शराब पीकर मरा बापू तेरा
खुशी से बताना यदि कोई पूछे

'विपुल'

Ghazal

आखिर वो कौन था , जो तुमसे मिलकर हारा नहीं, काफी है सूखी रोटी पेट को, नमक बगैर जखम का गुज़ारा नहीं। उसने बड़ी शिद्दत से लौटाया इश्क, बड़ी शिद्दत...