Thursday, February 1, 2024

Ghazal

आखिर वो कौन था , जो तुमसे मिलकर हारा नहीं,

काफी है सूखी रोटी पेट को, नमक बगैर जखम का गुज़ारा नहीं।


उसने बड़ी शिद्दत से लौटाया इश्क, बड़ी शिद्दत से वफ़ा अदा की,

मगर जिसका माथा चूमा गया, अफ़सोस वो हमारा नहीं।


समंदर निहारने से ज़्यादा आनंद है डूब जाने में,

ज़िंदगी सीखने मिलेगी लहरों से, सीखाता कुछ भी किनारा नहीं।


मौत देकर तड़पते देखने का सुकून छोड़ते भी तुम कैसे,

तुमने कोई जान नहीं बचाई, बस हमें जान से मारा नहीं।


मुहब्बत का हुनर सीखने का, जुटाएं कैसे हौंसला,

जो मुहब्बत लुटा रहा है, वो मुहब्बत कमा रहा नहीं।


तुम्हारे दुपट्टे से गुज़रती है थोड़ी एक्स्ट्रा ऑक्सीजन,

तुम पर लुट जाने के आलावा, था कोई और चारा नहीं।


बार-बार उन्ही हाथों से जाम पाकर थक गए थे,

सो साकी जा रहा था, और हमने कभी पुकारा नहीं।

Saturday, July 15, 2023

Ghazal

 

Ro rahaa hoon main , dekhtaa bhi nahee sarkaari afsar ,

Record mein kaise aayenge aansoo , sookh jaane ke baad .

 

Kyaa pahchaan aur behtar , ho nahi sakti ?

Jugnu pahchaane jaate hain shaam dhal jaane ke baad.

 

Aapko haq jataane se kisne rokaa hai sarkaar ,

Tax le lijiye magar kuchh wade nibhaane ke baad .

 

Kitnaa mushqeel aur mehnat hai izhaar mein ,

Papa ki photo har baar dekhtaa hu magar call kat jaane ke baad.

 

Hum musaafir nayaa raasta chunane se kyun rokenge ,

Beshaq ! Chale jaaiye , bas ik baar gale lagaane ke baad .

 

Koshishein kahaan jaanti hain bhed-bhaav kaa mathematics ,

Har baar usee tarah kiyaa nayaa ishq , puraane ke baad .

 

Ye gareebi taakne bhi nahee deti hain panne ,

Bachche aaj bhi khojte hain kaam , kitaabein aane ke baad .

 

Modern Love ka funda humein bhi samjhaaein Huzur !

Hum ab bhi dost hain ? itnaa waqt saath beetaane ke baad ?

 

Aapki taareefo kaa achaar lagaate thak gaye hum ,

Hum aapko yaad aate hain , laut aane ke baad.

 

Tum iss tarah vote maangoge to sach mein ro dungaa ,

Nahee ! ghaav nahi sookhte , khoon rukk jaane ke baad.

 

Muaavaze ki rakam theek samay par ghar aai thi ,

Magar ginta kaise koi , haath kat jaane ke baad .

 

Duniyaa ghoomti hai gol , chalti hai kismat ki lakeer par ,

Yee aap ab bataa rahe hain ? hunar dikhaane ke baad ?

 

Iss shaam ko harr oz bulaataa hai meraa intezaar ,

Magar chaand ko ab ghar jaanaa hai , pooraa dikh jaane ke baad.

 

Iss likhaawat mein galti se bhi jhaaknaa mat roti ,

Taaliyon ke liye chillaanaa padtaa hai , gazhal sunaane ke baad.

 

Har kisi ke ghar mein chaarpaai aur chulhaa hi hai dost ,

Aakhir kitni Roshni ho jaaegi , sabke gharo ko jalaane ke baad.

 

Pool giraane mein waqt – paisaa barbaad karnaa hai bewakoofi ,

Bread giraa dee jaayengi aasmaan se , baadh aa jaane ke baad.

 

Ek din mein deewaaro kaa bann jaanaa hai Unnati ,

Imaarat sundar lagati hai , bastiyaan giraane ke baad.

 

Kyaa bataaoon ! Khoob chubhati hai logo ki hansee mujhe ,

Magar har koi ban jaataa hai putlaa , unse haath milaane ke baad.

 

Kaash ! sadak se pahle tum gaaon , pahle aa jaate ,

Jantaa maalaa phenk chuki hai , phool murjhaane ke baad.

Duniyaa, duniyaa , bas duniyaa kaa swaarath ,

Jeena bhi Naseeb hogaa Jannat mein , mar jaane ke baad .

 

                                                @ Shaayar_Bamlesh_Khuraafaati

Saturday, May 7, 2022

गज़ल

गलती तुम्हारी जो इतनी जल्दी हौसला सींचते हो
सामनेवाला तो बस मन बहला रहा था 

मैं आज भी अपनी आशिक़ी पर नाज़ करता हूँ
आखिर मैं हारा भी तो जिस्म के खेल में हारा था 

नादान हँसते हैं मुझपर कि मैंने आँखें बंद रखीं
उन्हें क्या पता मैं किस कदर रिस्ता निभा रहा था 

मौत की जल्दी इसीलिए कि उसे ये दिखा सके
दम तोड़ते हमने उसका नाम नहीं पुकारा था 

अब इससे ज़्यादा इश्क़ में और कितना डूबें भला
मुशायरों में बस उसी को याद किये जा रहा था 

उसका हुनर रहा है, धोखा मत खाओ विपुल
वो रोया नहीं बस तुम्हें आंसू दिखा रहा था 

बस इसीलिए मैं ऊपरवाले को भला नहीं समझता
वो तब लौटा जब मैं उसकी तस्वीर जला रहा था

Wednesday, February 9, 2022

गज़ल

 वो गज़लें किसी और को सुनाने लगे 

लो हम आखिर उन्हें भुलाने लगे 

इस तरह तो आँखें सूख जातीं 

देर सही , कुछ दर्द ठिकाने लगे 


जो लोग रखते थे जूनून की

न जाने  कितनी मिसालें 

मेरे इक अदने सवाल पर 

अपनी उम्र बताने लगे 


मैंने हँसने वालों की थकान 

करीब से देखी है 

बस खुदा करे ये आँसू 

वापस आने लगें 


तोहफ़े खातिर पैसे बचाए 

मगर डर नोटबंदी का 

सो बस अब उन पैसों से 

रकीबों को चाय पिलाने लगे 


रईसों के बच्चे थक चुके थे 

हर चीज़ को पाकर 

कमी महसूस करनी थी 

तो उसकी गली को जाने लगे 


वो इक पल नाराज़ होती 

और अगले पल मान जाती 

मगर अब रूठी रहती है

जो उसे ग़ैर मनाने लगे 


दिल हार चुका था सब लेकिन  

हारता कैसे उम्मीदें 

जरूर होगा ऐसा कि 

मेरी सिस्कियाँ उसके शहर जाने लगें 


नायाब की ख़्वाइश तो 

कबकी घोंट गए हम 

ज़िंदा रहने को ज़रूरी था 

सो बस दिल बहलाने लगे 


उम्र काट तन्हाई की 

होंगे हम दोनों फिर तनहा 

इंतज़ार उस वक़्त का तबतक 

दुनिया को झूठ दिखाने लगे 

                                   विपुल 

Sunday, September 5, 2021

ग़ज़ल

धुएं में धुवां नहीं  साँसें  खोजो

शहर का हर शख़्स ही धुएं में पला है 


रोकने की ज़िद में याद आने लगती है

अब जब मुसाफिर टपकती छत छोड़ चला है 


मैंने तो कबका भुला दिया,लोगों के कहे पे याद है 

है हज़ारों का कातिल मगर आदमी भला है 


मैंने कुछ और सोच कर साकी का हाथ थामा था 

यहाँ तो बस जाम गिनने का मुकाबला है 


हाकिम और रंगरेज़ के हुनर को एक मानों

घाव ठीक करना और रंग देना, दोनों ही कला है 

 

लिख तो लिया मगर उसे सुनाएं कैसे 

कल भी एक मसला था , आज भी मसला है  

                                                          - विपुल 

                                                     

                                              



 

Saturday, October 31, 2020

मुझे खुद पर धिक्कार होना चाहिए


जब तेरे दर्द को लिखने पर खत्म हो जाए मेरी सियाही
जब लोकतंत्र की आड़ में चल रही हो राजशाही
ऐसी गली व्यवस्था से इंकार होना चाहिए 
........और गर हो न ऐसा
तो मुझे ख़ुद पर धिक्कार होना चाहिए


जब तेरे हक की न मांगू मैं दुआएं
जब इकलौती डिबरी भी तेरे घर की बुझ जो जाए
तब मेरी किस्मत में न कोई खुशी न त्यौहार होना चाहिए
........और गर हो न ऐसा
तो मुझे ख़ुद पर धिक्कार होना चाहिए


जो तेरे दर्द बयाँ करने का प्रयास कर रहा हो
जो तेरी आँख भर आने पर ख़ुद मर रहा हो
मेरा क़ुरान ,मेरा रामायण वो अखबार होना चाहिए
........और गर हो न ऐसा
तो मुझे ख़ुद पर धिक्कार होना चाहिए


जो तेरी मेरी नफ़रत के बीच राजनीति चमकाए
हमारी हज़ार आह पर जिसका ज़मीर चकनाचूर न हो जाए
ऐसा न संसद धाम में मौजूद कोई मक्कार होना चाहिए
........और गर हो न ऐसा
तो मुझे ख़ुद पर धिक्कार होना चाहिए


जो मुझे अय्याशी की चमक भा रही हो
जो मौजूद रहूँ मैं उस कोठे में जहाँ तेरी बेटी नाच गा रही हो
तेरी लाश पर टिका न कोई ऐसा मेला या बाज़ार होना चाहिए
........और गर हो न ऐसा
तो मुझे ख़ुद पर धिक्कार होना चाहिए


जब तेरे घाव पर मरहम करते , मेरी जात बीच में आ जाए
जब तेरे शहीद होने पर ये विपुल संवेदनहीन हो जाए
ऐसा न कोई दिन या लम्हा भी एक बार होना चाहिए
........और गर हो न ऐसा
तो मुझे ख़ुद पर धिक्कार होना चाहिए

Thursday, August 27, 2020

क्या रक्खा है !

मज़ा तो तब जब तुम्हारे बाल संवारते सुनाएँ
वगरना ग़ज़ल सुनाने में क्या रक्खा है

मुझे अपनी किस्मत से वफ़ा की उम्मीद नहीं
तुझे खोने के डर से इकरार को दबा रक्खा है

आइना होगा तो उम्र पर हँसेगा सो पटक दिया
हमने इसी बेपरवाही से ख़ुद को जवां रक्खा है

अदालत की कार्रवाई ! मियाँ मज़ाक छोड़ो
मेरे गुनाह से पहले तैयार फैसला रक्खा है

तेरा ज़िक्र छेड़ने से ख़ुद को रोक नहीं पाते
ये तुमने हमें क्या सिखा रक्खा है

हवाओं के बदलने का इंतज़ार कमज़ोरों को था
हमने तो ख़ुद ही कबसे दिया बुझा रक्खा है

तू नहीं तो अब वो घड़ी मिले
जिसमें तेरी आँखों का मज़ा रक्खा है

कोई है मेरे अंदर जिसे तेरे लौटने की उम्मीद है
इसी उम्मीद पर सबको , तेरा चेहरा बता रक्खा है

             
                                                         -  विपुल

Ghazal

आखिर वो कौन था , जो तुमसे मिलकर हारा नहीं, काफी है सूखी रोटी पेट को, नमक बगैर जखम का गुज़ारा नहीं। उसने बड़ी शिद्दत से लौटाया इश्क, बड़ी शिद्दत...